महाविष्णु: अनंत ब्रह्मांडों के दिव्य स्रोत

महाविष्णु: अनंत ब्रह्मांडों के दिव्य स्रोत
December 19, 2025
Dieties/devta gan
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महाविष्णु: अनंत ब्रह्मांडों के दिव्य स्रोत

महाविष्णु सृष्टि के मौन मूल स्रोत हैं, जो समय और आकाश से परे कारण सागर में योगनिद्रा में स्थित हैं। उनकी प्रत्येक दिव्य श्वास से असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं और पुनः उन्हीं में विलीन हो जाते हैं। महाविष्णु का स्मरण हमें यह बोध कराता है कि सम्पूर्ण अस्तित्व परमात्मा की इच्छा से प्रवाहित होता है, और वही प्रभु प्रत्येक हृदय में करुणा स्वरूप वास करते हैं।
हिंदू सनातन परंपरा में ईश्वर की अवधारणा अत्यंत व्यापक, गूढ़ और करुणामय है। इसी दिव्यता का एक अत्यंत विराट स्वरूप हैं महाविष्णु, जिन्हें समस्त सृष्टि का कारण और आधार माना गया है। वे केवल ब्रह्मांड के निर्माता नहीं हैं, बल्कि वह परम चेतना हैं जिनकी इच्छा मात्र से असंख्य लोकों की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है।

कारण सागर में स्थित परमेश्वर

महाविष्णु, जिन्हें कारणोदकशायी विष्णु भी कहा जाता है, भौतिक सृष्टि से परे कारण सागर में योगनिद्रा में स्थित रहते हैं। यह निद्रा अज्ञान की नहीं, बल्कि पूर्ण जागरूकता और संतुलन की अवस्था है। कारण सागर वह दिव्य क्षेत्र है जहाँ सृष्टि अभी अव्यक्त रूप में विद्यमान रहती है।

जब महाविष्णु प्रकृति पर अपनी कृपा दृष्टि डालते हैं, तभी सृष्टि का प्रारंभ होता है।

भगवान की श्वास से सृष्टि

भागवत पुराण में अत्यंत सुंदर वर्णन आता है कि महाविष्णु की प्रत्येक श्वास से अनगिनत ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं, और श्वास के संकोचन से वे सभी पुनः उन्हीं में विलीन हो जाते हैं। यह वर्णन यह दर्शाता है कि सृष्टि कोई परिश्रम नहीं, बल्कि ईश्वर की सहज लीला है।

यह भाव भक्त के भीतर गहन विनम्रता उत्पन्न करता है—हमारा जीवन, हमारा संसार, सब कुछ प्रभु की श्वास में स्थित है।

पुरुष अवतारों की त्रिमूर्ति

महाविष्णु स्वयं तीन पुरुष अवतारों के रूप में सृष्टि संचालन करते हैं—

कारणोदकशायी विष्णु (महाविष्णु) – अनंत ब्रह्मांडों की उत्पत्ति करते हैं

गर्भोदकशायी विष्णु – प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रवेश कर ब्रह्मा को प्रकट करते हैं

क्षीरदकशायी विष्णु – प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा रूप में विराजमान रहते हैं

इस प्रकार वही प्रभु बाहर भी हैं और भीतर भी।

ब्रह्मा और शिव के स्रोत

वैष्णव दर्शन के अनुसार, ब्रह्मा और शिव की उत्पत्ति भी विष्णु से ही होती है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं और शिव संहार एवं परिवर्तन का कार्य करते हैं, जबकि महाविष्णु इन सभी क्रियाओं से परे रहकर साक्षी रूप में स्थित रहते हैं।

यह व्यवस्था प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि दिव्य समन्वय को दर्शाती है।

श्रीकृष्ण और महाविष्णु

भक्ति परंपराओं में, विशेष रूप से गौड़ीय वैष्णव मत में, श्रीकृष्ण को स्वयं भगवान माना गया है। उन्हीं से महाविष्णु का विस्तार होता है, जो भौतिक सृष्टि की रचना का भार संभालते हैं, ताकि जीवात्माएँ अपने कर्मों के माध्यम से अंततः भगवान की शरण में लौट सकें।

इस प्रकार महाविष्णु की विराटता के पीछे श्रीकृष्ण की करुणा छिपी हुई है।

कारण सागर का आध्यात्मिक अर्थ

कारण सागर उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ सृष्टि अभी प्रकट नहीं हुई है। उस सागर पर शेषनाग पर शयन करते महाविष्णु यह दर्शाते हैं कि अव्यवस्था भी ईश्वर के नियंत्रण में है। उनकी योगनिद्रा हमें धैर्य, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण का संदेश देती है।

भक्त के लिए संदेश

महाविष्णु का ध्यान भक्त को अहंकार से मुक्त करता है और श्रद्धा से भर देता है। वही प्रभु जो अनंत ब्रह्मांडों का संचालन करते हैं, भक्त की एक पुकार भी सुनते हैं। उनका स्मरण मन को शुद्ध करता है और आत्मा को शांति प्रदान करता है।

उपसंहार

महाविष्णु सम्पूर्ण सृष्टि के मौन संरक्षक हैं—जिनकी श्वास में लोक बसते हैं और जिनकी कृपा से जीव मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। उनके चरणों में समर्पण ही जीवन का परम उद्देश्य है।

नारायण नारायण।