ललिता शक्तिपीठ: आद्य शक्ति का दिव्य सिंहासन

ललिता शक्तिपीठ: आद्य शक्ति का दिव्य सिंहासन
December 13, 2025
Dieties/devta gan
1 min read

ललिता शक्तिपीठ: आद्य शक्ति का दिव्य सिंहासन

ललिता शक्तिपीठ देवी शक्ति के सर्वोच्च स्वरूप माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी से जुड़ा एक दिव्य शक्तिकेंद्र है। यह शक्तिपीठ श्रीविद्या और शाक्त दर्शन का मूल आधार है, जहाँ भोग और मोक्ष का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। ललिता शक्तिपीठ केवल एक स्थान नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है जहाँ सौंदर्य, आनंद और ब्रह्मज्ञान एक हो जाते हैं।
भारत की आध्यात्मिक भूमि पर जहाँ-जहाँ देवी शक्ति के चरण पड़े, वहाँ-वहाँ शक्ति के अमर केंद्र स्थापित हो गए। इन्हीं को शक्तिपीठ कहा जाता है। शक्तिपीठ केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे ऊर्जाक्षेत्र हैं जहाँ शक्ति (ऊर्जा) और शिव (चेतना) का शाश्वत मिलन होता है।

इन पवित्र शक्तिपीठों में ललिता शक्तिपीठ का स्थान अत्यंत रहस्यमय, गूढ़ और दार्शनिक है। यह शक्तिपीठ माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी से संबद्ध है, जो देवी शक्ति की सर्वोच्च, पूर्ण और परम अभिव्यक्ति मानी जाती हैं। ललिता केवल सौंदर्य की देवी नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांडीय चेतना, आनंद और सत्ता का मूल स्रोत हैं।

यह लेख ललिता शक्तिपीठ की पौराणिक कथा, आध्यात्मिक महत्व, श्रीविद्या परंपरा, दर्शन और आधुनिक प्रासंगिकता को विस्तार से प्रस्तुत करता है।

शक्तिपीठों की उत्पत्ति: सती और शिव की अमर कथा

शक्तिपीठों की उत्पत्ति की कथा देवी सती और भगवान शिव से जुड़ी है। राजा दक्ष द्वारा शिव का अपमान किए जाने पर, देवी सती ने यज्ञकुंड में अपने प्राण त्याग दिए। इस असहनीय पीड़ा से व्याकुल होकर शिव ने सती के निर्जीव शरीर को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में तांडव आरंभ कर दिया।

सृष्टि के संतुलन हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को पृथ्वी पर गिरा दिया। जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

शास्त्रों में शक्तिपीठों की संख्या:

51

52

या 108
बताई गई है।

प्रत्येक शक्तिपीठ में:

देवी का एक रूप

सती का एक अंग

और शिव का एक भैरव स्वरूप
पूजा जाता है।

ललिता शक्तिपीठ इन्हीं पवित्र शक्तिपीठों में से एक है।

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी कौन हैं?

माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी शक्ति के सर्वश्रेष्ठ, सर्वसंपूर्ण और परम स्वरूपों में से एक हैं। उनका वर्णन विशेष रूप से मिलता है:

ब्रह्माण्ड पुराण

ललिता सहस्रनाम

त्रिपुरा रहस्य

नाम का अर्थ:

ललिता – सहज, कोमल, क्रीड़ामयी देवी

त्रिपुरा – तीनों लोकों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) की अधीश्वरी

सुंदरी – परम सौंदर्य की अधिष्ठात्री

वे:

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर पर स्थित सिंहासन पर विराजमान हैं

पुष्प-बाण, इक्षुधनुष, पाश और अंकुश धारण करती हैं

आनंद, करुणा और प्रभुत्व की साक्षात मूर्ति हैं

शाक्त दर्शन में ललिता साक्षात ब्रह्म हैं—वही जिनसे सृष्टि उत्पन्न होती है और जिनमें लीन हो जाती है।

ललिता शक्तिपीठ: स्थान और पौराणिक मान्यताएँ

ललिता शक्तिपीठ का भौगोलिक स्थान विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग बताया गया है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार:

इसका संबंध प्रयागराज (त्रिवेणी संगम) से जोड़ा जाता है

अन्य शाक्त-तांत्रिक परंपराओं में:

ललिता शक्तिपीठ को सूक्ष्म या आध्यात्मिक शक्तिपीठ माना गया है

यह विविधता इस सत्य को दर्शाती है कि:

शक्तिपीठ केवल भौतिक स्थान नहीं, बल्कि चेतना के केंद्र होते हैं।

सती का अंग और भैरव

कुछ सूचियों में माना जाता है कि यहाँ:

देवी सती की उँगलियाँ गिरी थीं

और भैरव स्वरूप शिव या भाव भैरव हैं

श्रीविद्या परंपरा और ललिता शक्तिपीठ

ललिता शक्तिपीठ का सबसे गहरा संबंध श्रीविद्या साधना से है।

श्रीचक्र: ललिता का सजीव स्वरूप

श्रीविद्या का केंद्र है श्रीचक्र (श्रीयंत्र)। यह केवल यंत्र नहीं, बल्कि:

ब्रह्मांड का मानचित्र

मानव चेतना की संरचना

और मोक्ष का मार्ग
है।

श्रीचक्र के:

नौ आवरण

त्रिकोण, कमल और बिंदु
मानव आत्मा की यात्रा को दर्शाते हैं।

माँ ललिता श्रीचक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं।

ललिता शक्तिपीठ की उपासना को:

श्रीचक्र में प्रवेश करने की आध्यात्मिक यात्रा
माना जाता है।

ललिता शक्तिपीठ का आध्यात्मिक महत्व

ललिता शक्तिपीठ जीवन के उन आयामों को संतुलित करता है जिन्हें अक्सर विरोधी माना जाता है।

यह शक्तिपीठ सिखाता है:

भोग और मोक्ष एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं

सौंदर्य भी साधना है

आनंद भी आध्यात्मिक मार्ग है

यहाँ की उपासना से:

गहरे कर्मबंध कटते हैं

चेतना का विस्तार होता है

आत्मविश्वास और सृजनात्मकता बढ़ती है

पूजा, साधना और अनुष्ठान
ललिता सहस्रनाम

ललिता की उपासना का सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र है ललिता सहस्रनाम—जिसके प्रत्येक नाम में ब्रह्मांडीय शक्ति निहित है।

शुभ दिन

शुक्रवार

शारदीय नवरात्रि

प्रिय अर्पण

लाल पुष्प

कुमकुम

चंदन

मधुर नैवेद्य

तांत्रिक साधना में पूजा प्रायः आंतरिक होती है—मंत्र, ध्यान और भाव के माध्यम से।

दार्शनिक अर्थ और प्रतीक

ललिता शक्तिपीठ का दर्शन कहता है:

सृष्टि दुःख से नहीं, आनंद से उत्पन्न हुई है।

माँ ललिता की लीला यह दर्शाती है कि:

संसार त्यागने योग्य नहीं

बल्कि दिव्य रूप से जीने योग्य है

वे इच्छा, सौंदर्य और मुक्ति—तीनों को एक सूत्र में पिरो देती हैं।

आधुनिक समय में ललिता शक्तिपीठ की प्रासंगिकता

आज के तनावपूर्ण युग में माँ ललिता का संदेश अत्यंत सामयिक है।

वे सिखाती हैं:

करुणा से युक्त शक्ति

सौम्य नेतृत्व

जीवन से भागे बिना आध्यात्मिकता

ललिता शक्तिपीठ हमें स्मरण कराता है कि:

पूर्णता संसार को नकारने में नहीं,
बल्कि उसे चेतना से जीने में है।

उपसंहार: देवी का शाश्वत सिंहासन

ललिता शक्तिपीठ पत्थरों या सीमाओं में सीमित नहीं है।
वह वहाँ है—

जहाँ सौंदर्य को पवित्र माना जाए

जहाँ शक्ति को माँ समझा जाए

जहाँ भक्ति आनंद से जुड़ी हो

माँ ललिता सदा विराजमान हैं—
क्योंकि संपूर्ण ब्रह्मांड स्वेच्छा से उनका है।