विशालाक्षी मंदिर — शक्ति का दिव्य नेत्र

विशालाक्षी मंदिर — शक्ति का दिव्य नेत्र
November 13, 2025
Temple Mandir
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विशालाक्षी मंदिर — शक्ति का दिव्य नेत्र

वाराणसी का विशालाक्षी मंदिर 51 शक्ति पीठों में से एक है, जहाँ माना जाता है कि माता सती के कुंडल गिरे थे। “विशाल नेत्रों वाली” देवी विशालाक्षी करुणा, दृष्टि और ज्ञान की प्रतीक हैं। मदुरै की मीनाक्षी और कांचीपुरम की कामाक्षी के साथ वे त्रिशक्ति रूप बनाती हैं। गंगा तट के समीप स्थित यह मंदिर स्त्री शक्ति और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है, जो भक्तों को ज्ञान, शांति और मुक्ति का आशीर्वाद देता है।
विश्व की सबसे प्राचीन नगरी वाराणसी के हृदय में स्थित है विशालाक्षी मंदिर, जो देवी शक्ति को समर्पित एक अत्यंत पवित्र शक्ति पीठ है। ‘विशालाक्षी’ शब्द का अर्थ है — “वह जिनकी आँखें विशाल हैं”, जो माता की अनंत करुणा, ज्ञान और सर्वदृष्टि का प्रतीक है।

यह मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि सनातन धर्म की जीवंत धारा है, जहाँ स्त्री शक्ति की ऊर्जा घाटों, मंत्रों और वातावरण में प्रवाहित होती है। श्रद्धालु मानते हैं कि माँ विशालाक्षी अपने दर्शन से बुद्धि, संतुलन और मोक्ष प्रदान करती हैं।

पौराणिक महत्व — शक्ति पीठ की कथा

देवी पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, जब सती माता ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर देह त्याग दिया, तब भगवान शिव शोकविह्वल होकर उनका शरीर लेकर तांडव करने लगे। ब्रह्मांड के संतुलन हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए।

जहाँ-जहाँ माँ सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्ति पीठों की स्थापना हुई। कहा जाता है कि वाराणसी में माँ सती के कुंडल (या नेत्र) गिरे थे, जहाँ आज विशालाक्षी मंदिर स्थित है। इसी कारण यह स्थान ‘विशालाक्षी पीठ’ कहलाया।

इस प्रकार काशी केवल शिव से मुक्ति का नहीं, बल्कि शक्ति से करुणा और मातृत्व का भी प्रतीक है।

विशालाक्षी, कामाक्षी और मीनाक्षी का संबंध

माँ विशालाक्षी को त्रिशक्ति पीठों में से एक माना गया है।

मीनाक्षी (मदुरै) — करुणा की प्रतीक मछली-नेत्र देवी,

कामाक्षी (कांचीपुरम) — प्रेम और कामना की अधिष्ठात्री देवी,

विशालाक्षी (वाराणसी) — ज्ञान और दृष्टि की देवी।

कहा जाता है कि इन तीनों देवियों की आराधना करने से भक्त को प्रेम (काम), ज्ञान (ज्ञान) और मोक्ष — तीनों प्राप्त होते हैं।

स्थापत्य और आध्यात्मिक वातावरण

विशालाक्षी मंदिर गंगा जी के तट पर मीर घाट के समीप स्थित है। आकार में भले छोटा हो, परंतु इसका आध्यात्मिक प्रभाव अत्यंत गहन है। गर्भगृह में माँ की प्रतिमा लाल साड़ी, रजत आभूषणों और पुष्पों से सुसज्जित रहती है।

मंदिर की दीवारों पर वैदिक शिलालेख और मंत्र अंकित हैं। वातावरण “जय माँ विशालाक्षी” के जयघोष से गुंजायमान रहता है। यहाँ प्रतिदिन असंख्य श्रद्धालु विशेषकर महिलाएँ आती हैं, जो माँ से अपने परिवार की रक्षा, समृद्धि और सौभाग्य की प्रार्थना करती हैं।

प्रमुख पर्व और अनुष्ठान

मंदिर में वर्ष भर अनेक पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं —

नवरात्रि – जब देवी के नौ रूपों की आराधना होती है।

कजली तीज – स्त्रियों द्वारा शक्ति उपासना का पर्व।

श्रावण मास – जब शिव और शक्ति दोनों की संयुक्त पूजा की जाती है।

भक्त लाल चूड़ियाँ, सिंदूर, नारियल, और साड़ी माँ को अर्पित करते हैं। विवाहित स्त्रियाँ विशेष रूप से यहाँ आकर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

अन्नपूर्णा और विश्वनाथ से संबंध

माँ विशालाक्षी का संबंध काशी के अन्य दो प्रमुख मंदिरों से भी जुड़ा है —

विश्वनाथ मंदिर – जहाँ भगवान शिव स्वयं विराजते हैं,

अन्नपूर्णा मंदिर – जो जीवन का पोषण करती हैं,

विशालाक्षी मंदिर – जो ज्ञान और दृष्टि प्रदान करती हैं।

कहा जाता है कि काशी की तीर्थयात्रा इन तीनों देवालयों के दर्शन के बिना अधूरी रहती है।

प्रतीकात्मक अर्थ — सर्वदर्शी माता

माँ विशालाक्षी का नाम केवल उनके रूप का नहीं, बल्कि उनके स्वभाव का भी द्योतक है। उनकी विशाल आँखें दर्शाती हैं कि —

वे अपने भक्तों के दुखों को देखकर उनकी रक्षा करती हैं,

वे माया से परे सत्य का दर्शन कराती हैं,

वे जीवन में स्पष्टता और ज्ञान का संचार करती हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से, वे “साक्षी भाव” की प्रतीक हैं — जो मनुष्य के कर्म, भावना और चेतना को देखती और दिशा देती हैं।

भक्तों का अनुभव

विशालाक्षी मंदिर में प्रवेश करते ही भक्त को एक अद्भुत शांति और ऊर्जा का अनुभव होता है। मंत्रों की ध्वनि, चंदन और फूलों की सुगंध, गंगा की लहरों पर टिमटिमाते दीप — यह सब मिलकर भक्ति की अमर भावना जागृत करते हैं।

भक्त कहते हैं कि गर्भगृह में माँ की आँखें जैसे उन्हें देखती हैं — परखने के लिए नहीं, बल्कि सांत्वना देने और आशीर्वाद प्रदान करने के लिए।

आधुनिक संदर्भ में महत्व

आज के तनावपूर्ण युग में माँ विशालाक्षी की दृष्टि हमें करुणा, आत्मचेतना और संतुलन का संदेश देती है। वह हमें सिखाती हैं कि हर जीवन पवित्र है, हर व्यक्ति में दिव्यता है।

माँ विशालाक्षी आज भी ज्ञान, स्पष्टता और कृपा की मूर्ति बनकर हर साधक को प्रेरित करती हैं — अंधकार में प्रकाश की तरह।

विशालाक्षी मंदिर, वाराणसी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मातृत्व, करुणा और ज्ञान का प्रतीक है। यह स्थान शिव और शक्ति के मिलन, काशी और ब्रह्मांड के संगम का प्रतिनिधित्व करता है।

जो भी भक्त श्रद्धा से माँ के चरणों में झुकता है, उसे केवल आशीर्वाद नहीं, बल्कि एक दृष्टि प्राप्त होती है — यह स्मरण कि माँ की आँखें सदा खुली हैं, अपने प्रत्येक पुत्र-पुत्री पर निगाह रखे हुए।