देवउठनी एकादशी

देवउठनी एकादशी
October 31, 2025
Festival Fast
1 min read

देवउठनी एकादशी

देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, वह दिन है जब भगवान विष्णु अपने चार महीने के योगनिद्रा रूपी विश्राम से जागते हैं। इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है, जिसमें सभी शुभ कार्य स्थगित रहते हैं। जब विष्णु जागते हैं, तो पुनः संसार में शुभता, ऊर्जा और उत्सव का प्रवाह आरंभ होता है। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है — यह देवी तुलसी और भगवान विष्णु (शालिग्राम) के दिव्य मिलन का उत्सव है। यह विवाह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति और दिव्यता के संगम का प्रतीक है। तुलसी पृथ्वी की उर्वरता और समर्पण का प्रतीक हैं, जबकि विष्णु संरक्षण और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के प्रतीक हैं। इनका मिलन इस बात का संकेत है कि जब प्रकृति और परमात्मा एक हो जाते हैं, तब सृष्टि फिर से जागती है, जीवन में नव ऊर्जा और शुभता का संचार होता है। यही कारण है कि देवउठनी एकादशी से विवाह का शुभ समय प्रारंभ माना जाता है — यह दिन पुनर्जन्म, नवजीवन और ईश्वरीय प्रेम का उत्सव है।
देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह – देवताओं के जागरण और धरती के पुनर्जागरण का पर्व

कार्तिक मास की उजली भोर, जब आकाश में हल्की सुनहरी किरणें फैलती हैं और हवाओं में मिट्टी की गंध के साथ भक्ति की सुगंध मिलती है, तब आता है देवउठनी एकादशी—वह पावन दिन जब भगवान विष्णु चार महीनों की योगनिद्रा से जागते हैं।

चार महीनों तक, आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक, भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं। इस अवधि को चातुर्यमास कहा जाता है। इस दौरान न तो विवाह होते हैं, न कोई मांगलिक कार्य। केवल साधना, व्रत, और आंतरिक शुद्धि का समय होता है।

लेकिन जैसे ही देवउठनी एकादशी आती है, ऐसा लगता है मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड फिर से जीवन से भर उठता है। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है, और इसी दिन से आरम्भ होता है विवाह का मौसम, क्योंकि इसी दिन मनाया जाता है तुलसी विवाह—देवी तुलसी और भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का पावन मिलन।

भगवान विष्णु की योगनिद्रा का रहस्य

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को पालनहार कहा गया है। सृष्टि के संचालन के लिए उन्हें विश्राम और ध्यान की आवश्यकता होती है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन वे क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन उठते हैं।

इस अवधि में प्रकृति भी विश्राम करती है। वर्षा होती है, धरती नई ऊर्जा ग्रहण करती है, बीज अंकुरित होते हैं। मनुष्य को भी इस काल में संयम, ब्रह्मचर्य और साधना का पालन करने की सलाह दी जाती है।

इस तरह चातुर्यमास केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी आवश्यक है। यह शरीर और मन के संतुलन, तथा पृथ्वी और सृष्टि के पुनरुत्थान का काल है।

जब भगवान विष्णु जागते हैं, तो माना जाता है कि सृष्टि में शुभ कार्यों की गति पुनः प्रारम्भ हो जाती है। यही कारण है कि देवउठनी एकादशी के बाद विवाह, गृहप्रवेश, और अन्य मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ होते हैं।

तुलसी विवाह की दिव्य कथा

तुलसी, जिसे देवी वृंदा कहा जाता है, सतीत्व और भक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार, देवी वृंदा असुरराज जलंधर की पत्नी थीं। उनकी पतिव्रता शक्ति के कारण जलंधर को कोई देवता या दानव परास्त नहीं कर सकता था। देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।

भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा की भक्ति भंग की। जब वृंदा को यह ज्ञात हुआ कि वे अपने पति को नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु को देख रही थीं, तो उन्हें अत्यंत दुख हुआ। उन्होंने विष्णु को शाप दिया कि वे शिला बन जाएँ—और वह शिला आज शालिग्राम के नाम से पूजी जाती है।

वृंदा ने भी अपनी देह त्याग दी और तुलसी पौधे के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुईं। तब भगवान विष्णु ने कहा—

"हे वृंदा, तुम्हारी पवित्रता और भक्ति सदा अमर रहेगी। तुम मेरे पूजन की अनिवार्य अंग बनोगी। बिना तुम्हारे पत्तों के कोई भी पूजा पूर्ण नहीं होगी।"

इस प्रकार तुलसी विवाह की परंपरा आरम्भ हुई। यह विवाह केवल एक पौधे और देवता का नहीं, बल्कि भक्ति और ईश्वर के मिलन का प्रतीक है।

देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह क्यों किया जाता है

देवउठनी एकादशी का दिन भगवान विष्णु के जागरण का प्रतीक है। चार महीनों की योगनिद्रा के बाद जब भगवान विष्णु उठते हैं, तो यह सृष्टि में नई ऊर्जा और शुभता के संचार का प्रतीक बनता है।

इसीलिए इसी दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है, क्योंकि तुलसी देवी को भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माना गया है। यह विवाह देव और देवी के, आकाश और धरती के, चेतना और प्रकृति के मिलन का प्रतीक है।

यह दिन यह भी दर्शाता है कि जैसे भगवान जागते हैं, वैसे ही प्रकृति और मानव चेतना भी पुनः जागृत होती है।

तुलसी विवाह की विधि और परंपरा

तुलसी विवाह का आयोजन घरों और मंदिरों में अत्यंत श्रद्धा और आनंद के साथ किया जाता है। तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाया जाता है—लाल या पीले वस्त्रों से, चूड़ियों, बिंदी, हार और सिंदूर से। पौधे के पास भगवान विष्णु का प्रतीक शालिग्राम या उनकी प्रतिमा रखी जाती है।

कभी-कभी तुलसी को "वृंदावन" में स्थापित किया जाता है—एक छोटी वेदी जिसमें मिट्टी, दीपक, और तुलसी के पौधे होते हैं।
पंडित या घर की महिलाएं विवाह के मंत्रों का उच्चारण करती हैं, तुलसी और शालिग्राम को पवित्र सूत्र (मंगलसूत्र) से जोड़ा जाता है।

विवाह के बाद तुलसी के पास दीप जलाया जाता है और मिठाई, गन्ना, नारियल, और गुड़ का प्रसाद चढ़ाया जाता है। महिलाएं पारंपरिक विवाह गीत गाती हैं, और वातावरण में भक्ति, संगीत और आनंद की गूंज होती है।

यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति तुलसी विवाह करता है, उसे हजार कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

तुलसी और विष्णु का मिलन – धरती और आकाश का संगम

तुलसी को धरती का प्रतीक माना गया है—वह जो जीवन देती है, पवित्रता रखती है, और सबका पालन करती है।
विष्णु को आकाश या चेतना का प्रतीक माना जाता है—जो जीवन को दिशा और संतुलन देते हैं।

इन दोनों का मिलन दर्शाता है कि सृष्टि तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक प्रकृति और ईश्वर एक न हो जाएँ।
तुलसी विवाह इस शाश्वत सत्य की याद दिलाता है कि भक्ति और शक्ति का संगम ही जीवन की पूर्णता है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि

तुलसी विवाह का उल्लेख पद्म पुराण, स्कंद पुराण, और विष्णु पुराण में मिलता है।
पुराणों में कहा गया है कि यह परंपरा वैदिक युग से चली आ रही है, और संभवतः 2500 वर्ष से भी अधिक पुरानी है।

भारतीय समाज में तुलसी केवल एक पौधा नहीं, बल्कि गृहलक्ष्मी का प्रतीक है।
हर घर में तुलसी का पौधा होना समृद्धि, शुद्धता और शुभता का संकेत माना जाता है।
कहा जाता है—“जहाँ तुलसी का वास है, वहाँ पाप नहीं ठहरता।”

देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का आयोजन इसी भावना के साथ किया जाता है कि घर में सुख, समृद्धि और शांति बनी रहे।

वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टि

तुलसी पौधे के औषधीय गुणों का उल्लेख आयुर्वेद में विस्तार से मिलता है। यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है, हवा को शुद्ध करती है, और मौसम के बदलाव में शरीर को संक्रमण से बचाती है।

कार्तिक मास में तुलसी के पौधे के चारों ओर दीपक जलाना और परिक्रमा करना न केवल धार्मिक है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी है। तुलसी की सुगंध और धुएं से वातावरण में कीटाणुनाशक तत्व फैलते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हैं।

इसलिए, तुलसी विवाह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के संरक्षण और स्वास्थ्य का उत्सव भी है।

आध्यात्मिक महत्व

देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह हमें यह सिखाते हैं कि जीवन में विश्राम भी आवश्यक है, और पुनः जागरण भी।
जैसे भगवान विष्णु चार महीने विश्राम कर सृष्टि में नयी ऊर्जा लाते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी अपने जीवन में साधना और नवीनीकरण के लिए समय निकालना चाहिए।

तुलसी की तरह, भक्ति और समर्पण से हर आत्मा ईश्वर तक पहुँच सकती है।
वृंदा का त्याग और विष्णु का आशीर्वाद हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।

निष्कर्ष

देवउठनी एकादशी केवल देवताओं के जागरण का दिन नहीं है—यह सम्पूर्ण सृष्टि के पुनर्जन्म का प्रतीक है।
इस दिन जब भगवान विष्णु क्षीरसागर से उठते हैं, तब धरती पर जीवन की लहर दौड़ पड़ती है।

तुलसी और विष्णु का यह विवाह प्रेम, भक्ति, और पुनर्जागरण का अनोखा संगम है।
इस दिन से घरों में दीपक जलते हैं, गीत गाए जाते हैं, और मनुष्य के हृदय में नयी उमंग और श्रद्धा का संचार होता है।

यह पर्व हमें सिखाता है—
“भक्ति अमर है, जीवन चक्रीय है, और हर अंधकार के बाद नया प्रभात आता ही है।”