March 27, 2026
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चैत्र नवरात्रि दिवस 7 (2026) – माँ कालरात्रि
माँ कालरात्रि देवी दुर्गा का सातवां स्वरूप हैं, जिनकी पूजा चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। उन्हें सबसे उग्र और शक्तिशाली रूप माना जाता है, जो अंधकार और बुरी शक्तियों का नाश करती हैं।
माँ कालरात्रि गधे पर सवार होती हैं, उनके हाथों में तलवार और लौह अस्त्र होता है, और वे अपने भक्तों को सुरक्षा, साहस और निर्भयता का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
परिचय:
चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि को समर्पित होता है, जो शक्ति, संरक्षण और अज्ञान के नाश का प्रतीक हैं। उनका स्वरूप भले ही भयंकर दिखाई देता हो, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत शुभ और कल्याणकारी हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि डर और अंधकार का सामना साहस से करना चाहिए। भक्ति नाम के अनुसार, माँ कालरात्रि की उपासना से सभी प्रकार के भय समाप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
तिथि, नक्षत्र एवं पूजा मुहूर्त (2026):
साल 2026 में चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन 25 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा, जिसे सप्तमी तिथि कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में रहता है और बाद में रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है।
पूजा का शुभ समय प्रातः लगभग 06:00 बजे से 09:00 बजे तक है। अभिजीत मुहूर्त लगभग 12:00 बजे से 12:50 बजे तक रहेगा। संध्या पूजा का समय लगभग 06:10 बजे से 07:45 बजे तक है। समय स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।
दिन 7: माँ कालरात्रि की पूजा:
माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली है। उनका शरीर काला है, बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली के समान चमकने वाली माला होती है। उनकी तीन आँखें हैं, जो ब्रह्मांड की तीनों लोकों को दर्शाती हैं।
वे गधे (गर्दभ) पर सवार होती हैं। उनके चार हाथ होते हैं—एक हाथ में खड्ग (तलवार), दूसरे में लोहे का कांटा (वज्र या लौह अस्त्र), और अन्य दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में होते हैं।
भक्ति नाम के अनुसार, माँ कालरात्रि की पूजा से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और भक्तों को भय, दुख और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
माँ कालरात्रि की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दुष्ट राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया, तब देवी दुर्गा ने माँ कालरात्रि का रूप धारण किया। उन्होंने शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे भयंकर राक्षसों का संहार किया।
विशेष रूप से रक्तबीज नामक असुर के रक्त की हर बूंद से नया राक्षस उत्पन्न हो जाता था। तब माँ कालरात्रि ने अपने भयंकर रूप से उसका वध किया और उसकी हर बूंद को जमीन पर गिरने से पहले ही समाप्त कर दिया।
यह कथा दर्शाती है कि चाहे समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, शक्ति और साहस से उसे समाप्त किया जा सकता है।
पूजा विधि:
इस दिन भक्त प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल को शुद्ध करते हैं। माँ कालरात्रि को गुड़ (जग्गरी) का भोग लगाया जाता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
भक्त दीपक जलाकर माँ की आराधना करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और व्रत रखते हैं। सात्त्विक भोजन का पालन किया जाता है और मन को शांत व शुद्ध रखा जाता है।
भक्ति नाम के अनुसार, सच्चे मन से की गई पूजा से सभी प्रकार के भय दूर हो जाते हैं और जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है।
माँ कालरात्रि के मंत्र:
बीज मंत्र:
“ॐ देवी कालरात्र्यै नमः”
ध्यान मंत्र:
“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥”
इन मंत्रों का जाप करने से भय समाप्त होता है और शक्ति व सुरक्षा प्राप्त होती है।
आध्यात्मिक महत्व:
नवरात्रि का सातवां दिन सहस्रार चक्र से जुड़ा होता है, जो आध्यात्मिक जागृति और परम चेतना का प्रतीक है। माँ कालरात्रि की पूजा से व्यक्ति अपने अंदर के अज्ञान और अंधकार को दूर करता है और आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।
भक्ति नाम के अनुसार, यह दिन हमें सिखाता है कि अंधकार के बाद ही प्रकाश आता है, इसलिए जीवन में आने वाली कठिनाइयों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उनका सामना साहस और विश्वास के साथ करना चाहिए।
भक्तिनामा के साथ सभी प्रकार की पूजा के लिए अनुभवी पंडित ऑनलाइन बुक करें – आसान, विश्वसनीय और शुद्ध।
चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि को समर्पित होता है, जो शक्ति, संरक्षण और अज्ञान के नाश का प्रतीक हैं। उनका स्वरूप भले ही भयंकर दिखाई देता हो, लेकिन वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत शुभ और कल्याणकारी हैं। यह दिन हमें सिखाता है कि डर और अंधकार का सामना साहस से करना चाहिए। भक्ति नाम के अनुसार, माँ कालरात्रि की उपासना से सभी प्रकार के भय समाप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
तिथि, नक्षत्र एवं पूजा मुहूर्त (2026):
साल 2026 में चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन 25 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा, जिसे सप्तमी तिथि कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में रहता है और बाद में रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है।
पूजा का शुभ समय प्रातः लगभग 06:00 बजे से 09:00 बजे तक है। अभिजीत मुहूर्त लगभग 12:00 बजे से 12:50 बजे तक रहेगा। संध्या पूजा का समय लगभग 06:10 बजे से 07:45 बजे तक है। समय स्थान के अनुसार थोड़ा बदल सकता है।
दिन 7: माँ कालरात्रि की पूजा:
माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयंकर और शक्तिशाली है। उनका शरीर काला है, बाल बिखरे हुए हैं और गले में बिजली के समान चमकने वाली माला होती है। उनकी तीन आँखें हैं, जो ब्रह्मांड की तीनों लोकों को दर्शाती हैं।
वे गधे (गर्दभ) पर सवार होती हैं। उनके चार हाथ होते हैं—एक हाथ में खड्ग (तलवार), दूसरे में लोहे का कांटा (वज्र या लौह अस्त्र), और अन्य दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में होते हैं।
भक्ति नाम के अनुसार, माँ कालरात्रि की पूजा से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और भक्तों को भय, दुख और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
माँ कालरात्रि की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दुष्ट राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया, तब देवी दुर्गा ने माँ कालरात्रि का रूप धारण किया। उन्होंने शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसे भयंकर राक्षसों का संहार किया।
विशेष रूप से रक्तबीज नामक असुर के रक्त की हर बूंद से नया राक्षस उत्पन्न हो जाता था। तब माँ कालरात्रि ने अपने भयंकर रूप से उसका वध किया और उसकी हर बूंद को जमीन पर गिरने से पहले ही समाप्त कर दिया।
यह कथा दर्शाती है कि चाहे समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, शक्ति और साहस से उसे समाप्त किया जा सकता है।
पूजा विधि:
इस दिन भक्त प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल को शुद्ध करते हैं। माँ कालरात्रि को गुड़ (जग्गरी) का भोग लगाया जाता है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
भक्त दीपक जलाकर माँ की आराधना करते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और व्रत रखते हैं। सात्त्विक भोजन का पालन किया जाता है और मन को शांत व शुद्ध रखा जाता है।
भक्ति नाम के अनुसार, सच्चे मन से की गई पूजा से सभी प्रकार के भय दूर हो जाते हैं और जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है।
माँ कालरात्रि के मंत्र:
बीज मंत्र:
“ॐ देवी कालरात्र्यै नमः”
ध्यान मंत्र:
“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥”
इन मंत्रों का जाप करने से भय समाप्त होता है और शक्ति व सुरक्षा प्राप्त होती है।
आध्यात्मिक महत्व:
नवरात्रि का सातवां दिन सहस्रार चक्र से जुड़ा होता है, जो आध्यात्मिक जागृति और परम चेतना का प्रतीक है। माँ कालरात्रि की पूजा से व्यक्ति अपने अंदर के अज्ञान और अंधकार को दूर करता है और आत्मज्ञान की ओर बढ़ता है।
भक्ति नाम के अनुसार, यह दिन हमें सिखाता है कि अंधकार के बाद ही प्रकाश आता है, इसलिए जीवन में आने वाली कठिनाइयों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उनका सामना साहस और विश्वास के साथ करना चाहिए।
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