November 30, 2025
Spirituality
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हिन्दू धर्म के अनुसार पृथ्वी का विकास
न्दू ब्रह्माण्ड विज्ञान के अनुसार सृष्टि अनादि और चक्रीय है। ब्रह्म रूप परम चेतना से विष्णु तथा फिर ब्रह्मा प्रकट होते हैं जो सृष्टि की रचना करते हैं। पंचमहाभूतों से पृथ्वी का निर्माण होता है और भगवान विष्णु वाराह अवतार लेकर पृथ्वी को जल से ऊपर उठाते हैं। जीवों का विकास क्रमशः जलचर से मानव तक होता है। युगों और मन्वन्तरों के विशाल कालचक्र में यह विकास होता रहता है। प्रत्येक चक्र के अंत में प्रलय होता है और पुनः सृष्टि प्रारम्भ होती है। यह दर्शन सृष्टि और जीवन की गहन समझ प्रस्तुत करता है।
हिन्दू धर्म में सृष्टि की उत्पत्ति को एक अनन्त और चक्रीय प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है। यह प्रक्रिया सृष्टि, पालन और प्रलय के रूप में निरन्तर चलती रहती है। वैदिक, उपनिषद और पुराणों में इस सृष्टि और पृथ्वी के विकास का विस्तृत वर्णन मिलता है।
ब्रह्म से सृष्टि का प्रारम्भ
हिन्दू दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मूल स्रोत ब्रह्म है, जो सर्वव्यापक, शाश्वत और चेतनामय है। जब सृष्टि का नया चक्र प्रारम्भ होता है, तब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित रहते हैं। उन्हीं के नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा प्रकट होते हैं। ब्रह्मा सृष्टि की रचना का दायित्व संभालते हैं।
ब्रह्माण्ड का निर्माण और पंचमहाभूत
ब्रह्मा ‘ब्रह्माण्ड’ नामक स्वर्ण-डिंब में सृष्टि का विस्तार करते हैं। ऋग्वेद में इसे हिरण्यगर्भ कहा गया है। सृष्टि के निर्माण हेतु पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — उत्पन्न किए जाते हैं। प्रारम्भ में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलमय था, जिसे ‘नार’ कहा गया। इसी कारण विष्णु को नारायण कहा जाता है।
पृथ्वी का प्रकट होना और वाराह अवतार
जल में डूबी पृथ्वी को विष्णु वाराह रूप धारण कर ऊपर उठाते हैं। यह प्रसंग विष्णु पुराण और भागवत पुराण में विस्तार से वर्णित है। इसके बाद पृथ्वी पर सप्तद्वीप और सागर स्थापित होते हैं। इस प्रकार पृथ्वी ब्रह्माण्ड के नियत स्थान पर स्थित होकर जीवन हेतु अनुकूल बनती है।
जीवों का विकास
ब्रह्मा विभिन्न प्रकार के जीवों की रचना करते हैं जिसे सर्ग कहा जाता है। पुराणों के अनुसार जीवों का विकास क्रम इस प्रकार है:
• जलचर
• वनस्पति और पौधे
• सरीसृप और उभयचर
• पक्षी
• चौपाये व अन्य पशु
• आदिम मानव
• विकसित बुद्धि वाले मनुष्य
यह क्रम आधुनिक जैविक विकास सिद्धांत से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाता है।
कालचक्र और प्रलय
हिन्दू समय-मान अत्यन्त विशाल है। युगों और मन्वन्तरों के क्रम में लाखों-करोड़ों वर्षों का वर्णन मिलता है। एक कल्प समाप्त होने पर प्रलय होता है, जिसमें ब्रह्माण्ड पुनः अपने सूक्ष्म रूप में विलीन हो जाता है। उसके बाद नए चक्र के साथ सृष्टि वापस प्रारम्भ होती है। यह प्रक्रिया अनन्त तक चलती रहती है।
हिन्दू धर्म के अनुसार पृथ्वी और जीवन का विकास दिव्य शक्तियों और प्राकृतिक नियमों के समन्वय से होता है। सृष्टि केवल एक बार नहीं बनी, बल्कि निरन्तर बनती, बदलती और पुनः जन्म लेती रहती है। यह दर्शन ब्रह्माण्ड के रहस्य को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यधिक व्यापक रूप में प्रस्तुत करता है।
ब्रह्म से सृष्टि का प्रारम्भ
हिन्दू दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का मूल स्रोत ब्रह्म है, जो सर्वव्यापक, शाश्वत और चेतनामय है। जब सृष्टि का नया चक्र प्रारम्भ होता है, तब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित रहते हैं। उन्हीं के नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा प्रकट होते हैं। ब्रह्मा सृष्टि की रचना का दायित्व संभालते हैं।
ब्रह्माण्ड का निर्माण और पंचमहाभूत
ब्रह्मा ‘ब्रह्माण्ड’ नामक स्वर्ण-डिंब में सृष्टि का विस्तार करते हैं। ऋग्वेद में इसे हिरण्यगर्भ कहा गया है। सृष्टि के निर्माण हेतु पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश — उत्पन्न किए जाते हैं। प्रारम्भ में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलमय था, जिसे ‘नार’ कहा गया। इसी कारण विष्णु को नारायण कहा जाता है।
पृथ्वी का प्रकट होना और वाराह अवतार
जल में डूबी पृथ्वी को विष्णु वाराह रूप धारण कर ऊपर उठाते हैं। यह प्रसंग विष्णु पुराण और भागवत पुराण में विस्तार से वर्णित है। इसके बाद पृथ्वी पर सप्तद्वीप और सागर स्थापित होते हैं। इस प्रकार पृथ्वी ब्रह्माण्ड के नियत स्थान पर स्थित होकर जीवन हेतु अनुकूल बनती है।
जीवों का विकास
ब्रह्मा विभिन्न प्रकार के जीवों की रचना करते हैं जिसे सर्ग कहा जाता है। पुराणों के अनुसार जीवों का विकास क्रम इस प्रकार है:
• जलचर
• वनस्पति और पौधे
• सरीसृप और उभयचर
• पक्षी
• चौपाये व अन्य पशु
• आदिम मानव
• विकसित बुद्धि वाले मनुष्य
यह क्रम आधुनिक जैविक विकास सिद्धांत से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाता है।
कालचक्र और प्रलय
हिन्दू समय-मान अत्यन्त विशाल है। युगों और मन्वन्तरों के क्रम में लाखों-करोड़ों वर्षों का वर्णन मिलता है। एक कल्प समाप्त होने पर प्रलय होता है, जिसमें ब्रह्माण्ड पुनः अपने सूक्ष्म रूप में विलीन हो जाता है। उसके बाद नए चक्र के साथ सृष्टि वापस प्रारम्भ होती है। यह प्रक्रिया अनन्त तक चलती रहती है।
हिन्दू धर्म के अनुसार पृथ्वी और जीवन का विकास दिव्य शक्तियों और प्राकृतिक नियमों के समन्वय से होता है। सृष्टि केवल एक बार नहीं बनी, बल्कि निरन्तर बनती, बदलती और पुनः जन्म लेती रहती है। यह दर्शन ब्रह्माण्ड के रहस्य को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यधिक व्यापक रूप में प्रस्तुत करता है।