“सृष्टि की अधिष्ठात्री: माँ कूष्मांडा की अद्भुत शक्ति और कृपा”

“सृष्टि की अधिष्ठात्री: माँ कूष्मांडा की अद्भुत शक्ति और कृपा”
March 22, 2026
Festival Fast
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“सृष्टि की अधिष्ठात्री: माँ कूष्मांडा की अद्भुत शक्ति और कृपा”

चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन सृष्टि, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। पिछले दिनों में साहस और शक्ति प्राप्त करने के बाद यह दिन आंतरिक प्रकाश और आनंद का संकेत देता है। यह दिन माँ कूष्मांडा को समर्पित है, जो देवी दुर्गा का चौथा स्वरूप हैं। भक्तिनामा के अनुसार यह दिन जीवन में प्रकाश लाने और अंधकार को दूर करने का संदेश देता है।
वर्ष २०२६ में चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन २२ मार्च, रविवार को पड़ता है और इसे चतुर्थी तिथि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में स्थित रहता है और बाद में इसका परिवर्तन होता है। पूजा का शुभ समय प्रातः लगभग ०६:०५ बजे से ०८:५५ बजे तक माना जाता है, जबकि अभिजीत मुहूर्त लगभग १२:०० बजे से १२:५० बजे तक रहता है। इसके अतिरिक्त सायंकाल ०५:५० बजे से ०७:२५ बजे के बीच भी पूजा की जा सकती है। ये सभी समय माँ कूष्मांडा की उपासना के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।

दिवस ४: माँ कूष्मांडा की उपासना:

माँ कूष्मांडा को सृष्टि की रचयिता माना जाता है। मान्यता है कि जब चारों ओर अंधकार था, तब उन्होंने अपनी मधुर मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। उनका स्वरूप अष्टभुजा है, जिनके हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र, अमृत और कमंडल होते हैं। वे सिंह पर सवार रहती हैं और अपार ऊर्जा का संचार करती हैं।

भक्तिनामा के अनुसार माँ कूष्मांडा अपने भक्तों को स्वास्थ्य, धन, शक्ति और ज्ञान का आशीर्वाद देती हैं। उनकी उपासना से रोग दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

माँ कूष्मांडा की कथा:

पौराणिक मान्यता के अनुसार सृष्टि से पहले चारों ओर केवल अंधकार था। तब माँ कूष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से इस ब्रह्मांड की रचना की और संसार में प्रकाश फैलाया। ऐसा भी माना जाता है कि वे सूर्य के केंद्र में निवास करती हैं और पूरे जगत को ऊर्जा प्रदान करती हैं।

यह कथा हमें सिखाती है कि छोटी-सी सकारात्मकता भी बड़े अंधकार को दूर कर सकती है। भक्तिनामा के अनुसार उनकी भक्ति से जीवन में स्पष्टता और शक्ति प्राप्त होती है।

पूजा विधि:

इस दिन भक्त प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थान को सजाते हैं। माँ कूष्मांडा को मालपुआ, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। दीप प्रज्वलित कर पुष्प अर्पित किए जाते हैं और श्रद्धा के साथ मंत्रों का जाप किया जाता है। कई भक्त व्रत रखते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं।

मंत्र:

“ॐ देवी कूष्मांडायै नमः” बीज मंत्र है। “सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे” ध्यान मंत्र है। इन मंत्रों का नियमित जाप सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करता है।

आध्यात्मिक महत्व:

नवरात्रि का चौथा दिन अनाहत चक्र से जुड़ा हुआ है, जो प्रेम, करुणा और संतुलन का प्रतीक है। माँ कूष्मांडा की उपासना से हृदय में प्रेम और सकारात्मकता का विकास होता है। भक्तिनामा के अनुसार यह दिन आंतरिक आनंद और संतुलन को बढ़ाता है।

निष्कर्ष:

चैत्र नवरात्रि का चौथा दिन माँ कूष्मांडा को समर्पित है, जो सृष्टि, प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनकी उपासना से जीवन में सकारात्मकता, सुख और समृद्धि आती है। भक्तिनामा इस दिन को आंतरिक प्रकाश के जागरण का विशेष चरण मानता है।

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