March 20, 2026
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चैत्र नवरात्रि का तृतीय दिन: माँ चंद्रघंटा की पूजा, कथा और आध्यात्मिक महत्व
चैत्र नवरात्रि का तृतीय दिन माँ चंद्रघंटा की आराधना को समर्पित है, जो साहस और सुरक्षा की प्रतीक हैं। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन भय को दूर कर आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
परिचय:
चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन साधना की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ भक्त के भीतर साहस, शक्ति और आत्मविश्वास का जागरण होने लगता है। नवरात्रि के पहले दो दिनों में भक्ति और तप का आधार बनने के बाद तीसरा दिन शक्ति और संरक्षण का प्रतीक बन जाता है। यह दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन भय को दूर करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरने का विशेष अवसर प्रदान करता है।
तिथि, नक्षत्र और पूजा मुहूर्त (२०२६):
वर्ष २०२६ में चैत्र नवरात्रि का तृतीय दिवस २१ मार्च, शनिवार को पड़ता है और यह तृतीया तिथि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन चंद्रमा रेवती नक्षत्र से अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है। पूजा करने के लिए शुभ समय प्रातः लगभग ०६:१० बजे से ०९:०० बजे तक माना जाता है, जबकि अभिजीत मुहूर्त, जो अत्यंत शुभ माना जाता है, लगभग १२:०५ बजे से १२:५५ बजे तक रहता है। इसके अतिरिक्त श्रद्धालु सायंकाल ०५:४५ बजे से ०७:२० बजे के बीच भी पूजा कर सकते हैं। ये सभी समय माँ चंद्रघंटा की उपासना के लिए उपयुक्त माने जाते हैं, हालांकि स्थान के अनुसार इनमें थोड़ा अंतर हो सकता है।
तृतीय दिन: माँ चंद्रघंटा की आराधना:
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र घंटी के आकार में सुशोभित होता है, इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और वीरता से परिपूर्ण होता है। वे सिंह या बाघ पर सवार रहती हैं और उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
माँ चंद्रघंटा का यह रूप बुराई के विनाश और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है। भक्तिनामा के अनुसार, उनकी आराधना से जीवन में साहस, निर्भयता और आत्मबल की वृद्धि होती है तथा सभी प्रकार के भय और बाधाएँ समाप्त होती हैं।
माँ चंद्रघंटा की पौराणिक कथा:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ चंद्रघंटा देवी पार्वती का ही एक रूप हैं, जो भगवान शिव से विवाह के बाद प्रकट हुआ। विवाह के पश्चात उन्होंने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया और एक दिव्य योद्धा स्वरूप में प्रकट हुईं।
जब दुष्ट शक्तियाँ और असुर संसार में अत्याचार करने लगे, तब माँ चंद्रघंटा ने अपने उग्र रूप में उनका संहार किया। वे युद्ध के समय अत्यंत प्रचंड और शक्तिशाली रूप धारण करती हैं, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे अत्यंत शांत और करुणामयी रहती हैं।
भक्तिनामा के अनुसार, यह कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में हमें अन्याय और बुराई के सामने साहस के साथ खड़ा होना चाहिए, साथ ही अपने भीतर दया और संतुलन बनाए रखना चाहिए।
पूजा विधि और अनुष्ठान:
तृतीय दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा स्थल को पवित्र किया जाता है। माँ चंद्रघंटा को दूध, खीर और मिठाई का भोग लगाया जाता है, जो शांति और समृद्धि का प्रतीक है।
पूजा के समय दीप जलाकर, पुष्प अर्पित कर और श्रद्धा के साथ मंत्रों का जप किया जाता है। इस दिन व्रत रखने का भी विशेष महत्व होता है और सात्त्विक आहार ग्रहण किया जाता है। भक्तिनामा के अनुसार, इस दिन की पूजा से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और मन में आत्मविश्वास का संचार होता है।
माँ चंद्रघंटा के मंत्र:
माँ चंद्रघंटा की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्न मंत्रों का जप किया जाता है:
बीज मंत्र:
“ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः”
ध्यान मंत्र:
“पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता॥”
इन मंत्रों का नियमित जप करने से भय दूर होता है, मन में शांति आती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भक्तिनामा के अनुसार, मंत्र-जप साधक को दिव्य शक्ति से जोड़ने का प्रभावी माध्यम है।
आध्यात्मिक महत्व:
नवरात्रि का तीसरा दिन मणिपुर चक्र से संबंधित माना जाता है, जो शक्ति, ऊर्जा और आत्मविश्वास का केंद्र है। माँ चंद्रघंटा की पूजा से यह चक्र सक्रिय होता है, जिससे व्यक्ति में साहस, दृढ़ता और आत्मबल की वृद्धि होती है।
यह दिन हमें यह सिखाता है कि जीवन की चुनौतियों का सामना निर्भय होकर करना चाहिए। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन साधक को अपने भीतर की शक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष:
चैत्र नवरात्रि का तृतीय दिन माँ चंद्रघंटा की आराधना के माध्यम से साहस, शक्ति और सुरक्षा का संदेश देता है। यह दिन हमें जीवन में भय को त्यागकर आत्मविश्वास और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यदि इस दिन सच्चे मन से पूजा और साधना की जाए, तो जीवन में शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन साधक के भीतर छिपी दिव्य शक्ति को जागृत करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन साधना की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ भक्त के भीतर साहस, शक्ति और आत्मविश्वास का जागरण होने लगता है। नवरात्रि के पहले दो दिनों में भक्ति और तप का आधार बनने के बाद तीसरा दिन शक्ति और संरक्षण का प्रतीक बन जाता है। यह दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन भय को दूर करने और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरने का विशेष अवसर प्रदान करता है।
तिथि, नक्षत्र और पूजा मुहूर्त (२०२६):
वर्ष २०२६ में चैत्र नवरात्रि का तृतीय दिवस २१ मार्च, शनिवार को पड़ता है और यह तृतीया तिथि के रूप में मनाया जाता है। इस दिन चंद्रमा रेवती नक्षत्र से अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है। पूजा करने के लिए शुभ समय प्रातः लगभग ०६:१० बजे से ०९:०० बजे तक माना जाता है, जबकि अभिजीत मुहूर्त, जो अत्यंत शुभ माना जाता है, लगभग १२:०५ बजे से १२:५५ बजे तक रहता है। इसके अतिरिक्त श्रद्धालु सायंकाल ०५:४५ बजे से ०७:२० बजे के बीच भी पूजा कर सकते हैं। ये सभी समय माँ चंद्रघंटा की उपासना के लिए उपयुक्त माने जाते हैं, हालांकि स्थान के अनुसार इनमें थोड़ा अंतर हो सकता है।
तृतीय दिन: माँ चंद्रघंटा की आराधना:
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र घंटी के आकार में सुशोभित होता है, इसी कारण उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और वीरता से परिपूर्ण होता है। वे सिंह या बाघ पर सवार रहती हैं और उनके दस हाथों में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
माँ चंद्रघंटा का यह रूप बुराई के विनाश और भक्तों की रक्षा का प्रतीक है। भक्तिनामा के अनुसार, उनकी आराधना से जीवन में साहस, निर्भयता और आत्मबल की वृद्धि होती है तथा सभी प्रकार के भय और बाधाएँ समाप्त होती हैं।
माँ चंद्रघंटा की पौराणिक कथा:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ चंद्रघंटा देवी पार्वती का ही एक रूप हैं, जो भगवान शिव से विवाह के बाद प्रकट हुआ। विवाह के पश्चात उन्होंने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया और एक दिव्य योद्धा स्वरूप में प्रकट हुईं।
जब दुष्ट शक्तियाँ और असुर संसार में अत्याचार करने लगे, तब माँ चंद्रघंटा ने अपने उग्र रूप में उनका संहार किया। वे युद्ध के समय अत्यंत प्रचंड और शक्तिशाली रूप धारण करती हैं, लेकिन अपने भक्तों के लिए वे अत्यंत शांत और करुणामयी रहती हैं।
भक्तिनामा के अनुसार, यह कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में हमें अन्याय और बुराई के सामने साहस के साथ खड़ा होना चाहिए, साथ ही अपने भीतर दया और संतुलन बनाए रखना चाहिए।
पूजा विधि और अनुष्ठान:
तृतीय दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूजा स्थल को पवित्र किया जाता है। माँ चंद्रघंटा को दूध, खीर और मिठाई का भोग लगाया जाता है, जो शांति और समृद्धि का प्रतीक है।
पूजा के समय दीप जलाकर, पुष्प अर्पित कर और श्रद्धा के साथ मंत्रों का जप किया जाता है। इस दिन व्रत रखने का भी विशेष महत्व होता है और सात्त्विक आहार ग्रहण किया जाता है। भक्तिनामा के अनुसार, इस दिन की पूजा से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और मन में आत्मविश्वास का संचार होता है।
माँ चंद्रघंटा के मंत्र:
माँ चंद्रघंटा की कृपा प्राप्त करने के लिए निम्न मंत्रों का जप किया जाता है:
बीज मंत्र:
“ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः”
ध्यान मंत्र:
“पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता॥”
इन मंत्रों का नियमित जप करने से भय दूर होता है, मन में शांति आती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भक्तिनामा के अनुसार, मंत्र-जप साधक को दिव्य शक्ति से जोड़ने का प्रभावी माध्यम है।
आध्यात्मिक महत्व:
नवरात्रि का तीसरा दिन मणिपुर चक्र से संबंधित माना जाता है, जो शक्ति, ऊर्जा और आत्मविश्वास का केंद्र है। माँ चंद्रघंटा की पूजा से यह चक्र सक्रिय होता है, जिससे व्यक्ति में साहस, दृढ़ता और आत्मबल की वृद्धि होती है।
यह दिन हमें यह सिखाता है कि जीवन की चुनौतियों का सामना निर्भय होकर करना चाहिए। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन साधक को अपने भीतर की शक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष:
चैत्र नवरात्रि का तृतीय दिन माँ चंद्रघंटा की आराधना के माध्यम से साहस, शक्ति और सुरक्षा का संदेश देता है। यह दिन हमें जीवन में भय को त्यागकर आत्मविश्वास और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यदि इस दिन सच्चे मन से पूजा और साधना की जाए, तो जीवन में शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। भक्तिनामा के अनुसार, यह दिन साधक के भीतर छिपी दिव्य शक्ति को जागृत करने का महत्वपूर्ण अवसर है।