June 28, 2026
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ज्येष्ठ वट पूर्णिमा 2026: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व और आध्यात्मिक लाभ
29 जून 2026 को मनाई जाने वाली ज्येष्ठ वट पूर्णिमा के बारे में जानें। पढ़ें इसकी सही तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि, धार्मिक महत्व, लाभ तथा Bhaktinama की Online Puja Services के माध्यम से घर बैठे पूजा कराने की सुविधा।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं द्वारा मनाए जाने वाले सबसे पवित्र व्रतों में से एक है। यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात तथा दक्षिण भारत के कई राज्यों में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष (बरगद) की पूजा करती हैं और माता सावित्री के अखंड पतिव्रत धर्म, साहस और अटूट समर्पण का स्मरण करती हैं। माता सावित्री ने अपनी बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे।
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि तथा वैवाहिक जीवन में सदैव प्रेम और सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जल या फलाहार व्रत रखती हैं।
वर्ष 2026 में ज्येष्ठ वट पूर्णिमा का पर्व सोमवार, 29 जून 2026 को मनाया जाएगा।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा 2026: तिथि
पर्व: ज्येष्ठ वट पूर्णिमा
दिनांक: सोमवार, 29 जून 2026
माह: ज्येष्ठ
तिथि: पूर्णिमा
पूजा मुहूर्त: 08:55 से 10:40 AM
यदि आप किसी मंदिर नहीं जा सकते या व्यक्तिगत रूप से योग्य पंडित से पूजा नहीं करवा सकते, तो Bhaktinama की Online Puja Services के माध्यम से घर बैठे अनुभवी विद्वान पंडितों द्वारा विधिपूर्वक पूजा, व्रत एवं धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करा सकते हैं।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
वट वृक्ष को सनातन धर्म में अमरत्व, स्थिरता, शक्ति और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल शाखाएँ और सदैव जीवित रहने की क्षमता इसे अनंत जीवन का प्रतीक बनाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार—
वट वृक्ष की जड़ें भगवान ब्रह्मा का स्वरूप हैं।
इसका तना भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है।
इसकी शाखाएँ भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इसी कारण वट वृक्ष की पूजा करना त्रिदेव की आराधना के समान माना जाता है।
इस व्रत को करने से श्रद्धालुओं को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होने की मान्यता है—
पति की दीर्घायु
सुखी एवं सफल वैवाहिक जीवन
परिवार में सुख-शांति
आर्थिक समृद्धि
मानसिक धैर्य एवं आध्यात्मिक शक्ति
गृहस्थ जीवन में सौभाग्य
Bhaktinama के माध्यम से श्रद्धालु Online Puja Booking, डिजिटल संकल्प तथा योग्य वैदिक पंडितों से जुड़कर शास्त्रसम्मत पूजा आसानी से कर सकते हैं।
वट पूर्णिमा व्रत कथा
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा की सबसे प्रसिद्ध कथा माता सावित्री और सत्यवान की है।
मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्विनी, विदुषी और पतिव्रता थीं। उन्होंने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, जबकि उन्हें ज्ञात था कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है।
निर्धारित दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए। वहीं एक वट वृक्ष के नीचे उन्हें चक्कर आया और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
तभी यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे। माता सावित्री अपने पति के पीछे-पीछे यमराज के साथ चलती रहीं। उनकी अटूट भक्ति, बुद्धिमत्ता और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए।
सावित्री ने अत्यंत चतुराई से ऐसे वर मांगे जिनके पूर्ण होने के लिए सत्यवान का जीवित होना आवश्यक था। अंततः यमराज उनकी पतिव्रता शक्ति से प्रसन्न हुए और सत्यवान को पुनः जीवनदान दे दिया।
तभी से विवाहित महिलाएं इस व्रत को अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।
यदि आप भी शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करना चाहते हैं, तो Bhaktinama की Online Services के माध्यम से योग्य पंडितों से संपूर्ण व्रत कथा एवं पूजा विधि का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा पूजा विधि
इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ एवं पारंपरिक वस्त्र धारण करें।
पूजा सामग्री
कुमकुम
हल्दी
अक्षत
पुष्प
धूप
घी का दीपक
फल
मिठाई
कच्चा सूत
जल का कलश
पान के पत्ते
नारियल
पूजा करने की विधि
प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।
स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
व्रत का संकल्प लें।
वट वृक्ष के पास जाएँ।
उसकी जड़ों में जल अर्पित करें।
हल्दी और कुमकुम चढ़ाएँ।
पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
दीपक और धूप जलाएँ।
कच्चे सूत को वट वृक्ष के चारों ओर सात या उससे अधिक बार लपेटते हुए परिक्रमा करें।
सावित्री-सत्यवान की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
पति की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि एवं सुख-शांति की प्रार्थना करें।
अंत में आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
यदि आपके आसपास वट वृक्ष उपलब्ध नहीं है, तो Bhaktinama की Online Puja Booking के माध्यम से योग्य पंडितों से व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त कर विधिपूर्वक पूजा कर सकते हैं।
वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?
वट वृक्ष अपनी लंबी आयु और निरंतर बढ़ती हुई जड़ों के कारण अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह दर्शाता है—
स्थिरता
पारिवारिक एकता
ज्ञान
संरक्षण
दीर्घायु
ईश्वरीय कृपा
इसकी गहरी जड़ें हमें अपने धर्म और संस्कारों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती हैं, जबकि इसकी विशाल शाखाएँ संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक हैं।
Bhaktinama श्रद्धालुओं को Online Consultation के माध्यम से हिंदू धर्म के प्रतीकों, पूजा-पद्धतियों और आध्यात्मिक महत्व को सरल भाषा में समझने की सुविधा भी प्रदान करता है।
वट पूर्णिमा व्रत करने के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधिपूर्वक इस व्रत को करने से—
पति की आयु में वृद्धि
वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास
परिवार में सुख-समृद्धि
उत्तम स्वास्थ्य
आर्थिक उन्नति
जीवन की बाधाओं का निवारण
आध्यात्मिक उन्नति
भगवान विष्णु, भगवान शिव एवं माता सावित्री की कृपा प्राप्त होती है।
इस व्रत का वास्तविक फल केवल श्रद्धा, विश्वास और धर्मानुसार आचरण से प्राप्त होता है।
विदेशों या मंदिरों से दूर रहने वाले श्रद्धालुओं के लिए Bhaktinama Online Puja, वैदिक अनुष्ठान तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन को सरल और सुलभ बनाता है।
विभिन्न राज्यों में वट पूर्णिमा का उत्सव
वट पूर्णिमा विशेष रूप से निम्न राज्यों में बड़े उत्साह से मनाई जाती है—
महाराष्ट्र
गोवा
गुजरात
कर्नाटक
मध्य प्रदेश के कुछ भाग
दक्षिण भारत के कई क्षेत्र
इस अवसर पर महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर एकत्र होकर पूजा करती हैं, भजन-कीर्तन गाती हैं, व्रत कथा सुनती हैं तथा एक-दूसरे को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश
यह पर्व केवल एक व्रत या पूजा नहीं, बल्कि जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्यों की शिक्षा देता है—
कठिन समय में विश्वास
रिश्तों के प्रति समर्पण
साहस और धैर्य
बुद्धिमत्ता
सच्ची भक्ति की शक्ति
माता सावित्री का जीवन हमें सिखाता है कि अटूट श्रद्धा, धर्म और दृढ़ संकल्प के सामने कठिन से कठिन परिस्थिति भी बदल सकती है।
निष्कर्ष
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास, त्याग और समर्पण का उत्सव है। माता सावित्री और सत्यवान की कथा आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती है कि सच्ची भक्ति, धर्म और दृढ़ निश्चय के बल पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
29 जून 2026 को ज्येष्ठ वट पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता सावित्री तथा पवित्र वट वृक्ष की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य का वास हो।
यदि आप इस पावन व्रत को शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न करना चाहते हैं, तो Bhaktinama की Online Services के माध्यम से Online Puja Booking, अनुभवी वैदिक पंडितों का मार्गदर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं।
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि तथा वैवाहिक जीवन में सदैव प्रेम और सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जल या फलाहार व्रत रखती हैं।
वर्ष 2026 में ज्येष्ठ वट पूर्णिमा का पर्व सोमवार, 29 जून 2026 को मनाया जाएगा।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा 2026: तिथि
पर्व: ज्येष्ठ वट पूर्णिमा
दिनांक: सोमवार, 29 जून 2026
माह: ज्येष्ठ
तिथि: पूर्णिमा
पूजा मुहूर्त: 08:55 से 10:40 AM
यदि आप किसी मंदिर नहीं जा सकते या व्यक्तिगत रूप से योग्य पंडित से पूजा नहीं करवा सकते, तो Bhaktinama की Online Puja Services के माध्यम से घर बैठे अनुभवी विद्वान पंडितों द्वारा विधिपूर्वक पूजा, व्रत एवं धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करा सकते हैं।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
वट वृक्ष को सनातन धर्म में अमरत्व, स्थिरता, शक्ति और दीर्घायु का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल शाखाएँ और सदैव जीवित रहने की क्षमता इसे अनंत जीवन का प्रतीक बनाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार—
वट वृक्ष की जड़ें भगवान ब्रह्मा का स्वरूप हैं।
इसका तना भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है।
इसकी शाखाएँ भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इसी कारण वट वृक्ष की पूजा करना त्रिदेव की आराधना के समान माना जाता है।
इस व्रत को करने से श्रद्धालुओं को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होने की मान्यता है—
पति की दीर्घायु
सुखी एवं सफल वैवाहिक जीवन
परिवार में सुख-शांति
आर्थिक समृद्धि
मानसिक धैर्य एवं आध्यात्मिक शक्ति
गृहस्थ जीवन में सौभाग्य
Bhaktinama के माध्यम से श्रद्धालु Online Puja Booking, डिजिटल संकल्प तथा योग्य वैदिक पंडितों से जुड़कर शास्त्रसम्मत पूजा आसानी से कर सकते हैं।
वट पूर्णिमा व्रत कथा
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा की सबसे प्रसिद्ध कथा माता सावित्री और सत्यवान की है।
मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्विनी, विदुषी और पतिव्रता थीं। उन्होंने सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, जबकि उन्हें ज्ञात था कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है।
निर्धारित दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए। वहीं एक वट वृक्ष के नीचे उन्हें चक्कर आया और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
तभी यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे। माता सावित्री अपने पति के पीछे-पीछे यमराज के साथ चलती रहीं। उनकी अटूट भक्ति, बुद्धिमत्ता और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें कई वरदान दिए।
सावित्री ने अत्यंत चतुराई से ऐसे वर मांगे जिनके पूर्ण होने के लिए सत्यवान का जीवित होना आवश्यक था। अंततः यमराज उनकी पतिव्रता शक्ति से प्रसन्न हुए और सत्यवान को पुनः जीवनदान दे दिया।
तभी से विवाहित महिलाएं इस व्रत को अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।
यदि आप भी शास्त्रों के अनुसार इस व्रत को करना चाहते हैं, तो Bhaktinama की Online Services के माध्यम से योग्य पंडितों से संपूर्ण व्रत कथा एवं पूजा विधि का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा पूजा विधि
इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ एवं पारंपरिक वस्त्र धारण करें।
पूजा सामग्री
कुमकुम
हल्दी
अक्षत
पुष्प
धूप
घी का दीपक
फल
मिठाई
कच्चा सूत
जल का कलश
पान के पत्ते
नारियल
पूजा करने की विधि
प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।
स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
व्रत का संकल्प लें।
वट वृक्ष के पास जाएँ।
उसकी जड़ों में जल अर्पित करें।
हल्दी और कुमकुम चढ़ाएँ।
पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
दीपक और धूप जलाएँ।
कच्चे सूत को वट वृक्ष के चारों ओर सात या उससे अधिक बार लपेटते हुए परिक्रमा करें।
सावित्री-सत्यवान की व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
पति की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि एवं सुख-शांति की प्रार्थना करें।
अंत में आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
यदि आपके आसपास वट वृक्ष उपलब्ध नहीं है, तो Bhaktinama की Online Puja Booking के माध्यम से योग्य पंडितों से व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त कर विधिपूर्वक पूजा कर सकते हैं।
वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?
वट वृक्ष अपनी लंबी आयु और निरंतर बढ़ती हुई जड़ों के कारण अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह दर्शाता है—
स्थिरता
पारिवारिक एकता
ज्ञान
संरक्षण
दीर्घायु
ईश्वरीय कृपा
इसकी गहरी जड़ें हमें अपने धर्म और संस्कारों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती हैं, जबकि इसकी विशाल शाखाएँ संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक हैं।
Bhaktinama श्रद्धालुओं को Online Consultation के माध्यम से हिंदू धर्म के प्रतीकों, पूजा-पद्धतियों और आध्यात्मिक महत्व को सरल भाषा में समझने की सुविधा भी प्रदान करता है।
वट पूर्णिमा व्रत करने के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधिपूर्वक इस व्रत को करने से—
पति की आयु में वृद्धि
वैवाहिक जीवन में प्रेम और विश्वास
परिवार में सुख-समृद्धि
उत्तम स्वास्थ्य
आर्थिक उन्नति
जीवन की बाधाओं का निवारण
आध्यात्मिक उन्नति
भगवान विष्णु, भगवान शिव एवं माता सावित्री की कृपा प्राप्त होती है।
इस व्रत का वास्तविक फल केवल श्रद्धा, विश्वास और धर्मानुसार आचरण से प्राप्त होता है।
विदेशों या मंदिरों से दूर रहने वाले श्रद्धालुओं के लिए Bhaktinama Online Puja, वैदिक अनुष्ठान तथा आध्यात्मिक मार्गदर्शन को सरल और सुलभ बनाता है।
विभिन्न राज्यों में वट पूर्णिमा का उत्सव
वट पूर्णिमा विशेष रूप से निम्न राज्यों में बड़े उत्साह से मनाई जाती है—
महाराष्ट्र
गोवा
गुजरात
कर्नाटक
मध्य प्रदेश के कुछ भाग
दक्षिण भारत के कई क्षेत्र
इस अवसर पर महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर एकत्र होकर पूजा करती हैं, भजन-कीर्तन गाती हैं, व्रत कथा सुनती हैं तथा एक-दूसरे को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं।
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश
यह पर्व केवल एक व्रत या पूजा नहीं, बल्कि जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्यों की शिक्षा देता है—
कठिन समय में विश्वास
रिश्तों के प्रति समर्पण
साहस और धैर्य
बुद्धिमत्ता
सच्ची भक्ति की शक्ति
माता सावित्री का जीवन हमें सिखाता है कि अटूट श्रद्धा, धर्म और दृढ़ संकल्प के सामने कठिन से कठिन परिस्थिति भी बदल सकती है।
निष्कर्ष
ज्येष्ठ वट पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास, त्याग और समर्पण का उत्सव है। माता सावित्री और सत्यवान की कथा आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती है कि सच्ची भक्ति, धर्म और दृढ़ निश्चय के बल पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
29 जून 2026 को ज्येष्ठ वट पूर्णिमा के पावन अवसर पर भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता सावित्री तथा पवित्र वट वृक्ष की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य का वास हो।
यदि आप इस पावन व्रत को शास्त्रसम्मत विधि से संपन्न करना चाहते हैं, तो Bhaktinama की Online Services के माध्यम से Online Puja Booking, अनुभवी वैदिक पंडितों का मार्गदर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं।